The Citizen Files | विशेष रिपोर्ट

17 वर्षीय छात्र के ब्लॉग से उठे सवाल, CBSE की ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रक्रिया पर राष्ट्रीय बहस

टेंडर प्रक्रिया, मूल्यांकन प्रणाली और पारदर्शिता को लेकर उठे प्रश्न; मामला संसदीय समिति तक पहुँचा

नई दिल्ली। कभी-कभी एक सवाल पूरे सिस्टम का ध्यान अपनी ओर खींच लेता है। इस बार यह सवाल किसी राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन या बड़े मीडिया संस्थान ने नहीं, बल्कि कक्षा 12 के एक छात्र ने उठाया है।

17 वर्षीय छात्र सार्थक सिद्धांत द्वारा लिखे गए एक ब्लॉग ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली और उससे जुड़े टेंडर प्रक्रिया को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा छेड़ दी है।

सार्थक ने अपने ब्लॉग में दावा किया है कि CBSE द्वारा ऑन-स्क्रीन मूल्यांकन प्रणाली के लिए जारी टेंडरों में कुछ महत्वपूर्ण पात्रता शर्तों और तकनीकी मानकों में बदलाव किए गए, जिनसे एक विशेष कंपनी को लाभ मिला हो सकता है। ब्लॉग में प्रस्तुत निष्कर्ष सार्वजनिक रूप से उपलब्ध टेंडर दस्तावेजों के विश्लेषण पर आधारित बताए गए हैं।

क्या है पूरा मामला?

CBSE ने उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन को डिजिटल बनाने के लिए ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली लागू की है। इसके लिए एक निजी तकनीकी सेवा प्रदाता का चयन टेंडर प्रक्रिया के माध्यम से किया गया।

सार्थक के अनुसार, मई 2025 में जारी एक टेंडर में सभी बोलीदाताओं को तकनीकी मूल्यांकन में असफल घोषित कर दिया गया था। इसके बाद जारी नए टेंडर में पात्रता और तकनीकी शर्तों में कई बदलाव किए गए।

ब्लॉग में दावा किया गया है कि इन बदलावों में—

  • CMMI Level-5 की अनिवार्यता को Level-3 करना,
  • कुछ ब्लैकलिस्टिंग प्रावधानों में संशोधन,
  • परियोजना अनुभव की परिभाषा में बदलाव,
  • डेटा सेंटर संबंधी शर्तों में परिवर्तन,
  • तथा अन्य तकनीकी पात्रता मानकों में संशोधन शामिल थे।

हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक किसी आधिकारिक जांच द्वारा नहीं की गई है।

राष्ट्रीय मीडिया में चर्चा

सार्थक का ब्लॉग प्रकाशित होने के बाद कई राष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने इस विषय पर रिपोर्ट प्रकाशित की।

अनेक समाचार रिपोर्टों में ब्लॉग में किए गए दावों, टेंडर दस्तावेजों के विश्लेषण और छात्रों के बीच उठ रही चिंताओं को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इस विषय ने सोशल मीडिया पर भी व्यापक चर्चा को जन्म दिया।

संसदीय समिति तक पहुँचा मामला

सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम तब सामने आया जब सार्थक सिद्धांत को शिक्षा, महिला, बाल, युवा एवं खेल मामलों से संबंधित संसदीय स्थायी समिति के समक्ष अपने निष्कर्ष प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित किया गया।

यह घटनाक्रम इस पूरे मामले को केवल सोशल मीडिया बहस से आगे ले जाकर संस्थागत चर्चा के दायरे में ले आया।

CBSE का पक्ष

उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों के अनुसार CBSE का कहना है कि अनुबंध निर्धारित नियमों, पात्रता मानदंडों और वित्तीय बोली प्रक्रिया के अनुसार प्रदान किया गया। बोर्ड का पक्ष है कि चयन प्रक्रिया स्थापित सरकारी खरीद नियमों के अनुरूप संपन्न हुई।

अब तक CBSE द्वारा सार्थक के ब्लॉग में उठाए गए प्रत्येक बिंदु पर विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया जारी नहीं की गई है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?

यह मामला केवल एक टेंडर या एक तकनीकी कंपनी तक सीमित नहीं है।

यह प्रश्न उठाता है कि—

  • सार्वजनिक संस्थानों की खरीद प्रक्रियाएँ कितनी पारदर्शी हैं?
  • डिजिटल मूल्यांकन प्रणालियों की जवाबदेही कैसे सुनिश्चित की जाए?
  • छात्रों के डेटा और परीक्षा परिणामों की सुरक्षा के लिए क्या पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं?
  • और क्या नागरिकों द्वारा किए गए स्वतंत्र विश्लेषणों को संस्थागत स्तर पर गंभीरता से लिया जाना चाहिए?

The Citizen Files की टिप्पणी

लोकतंत्र में सवाल पूछना व्यवस्था के खिलाफ नहीं, बल्कि व्यवस्था को मजबूत करने का माध्यम है।

सार्थक सिद्धांत के ब्लॉग में लगाए गए आरोप सही हैं या गलत, इसका निर्णय किसी स्वतंत्र जांच, तथ्यात्मक परीक्षण या आधिकारिक प्रक्रिया से ही हो सकता है।

लेकिन यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि एक 17 वर्षीय छात्र द्वारा उठाए गए सवाल राष्ट्रीय मीडिया, सोशल मीडिया और संसदीय समिति तक पहुँच चुके हैं।

अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि इन सवालों के जवाब कौन और कैसे देता है।


(यह रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध दस्तावेजों, मीडिया रिपोर्टों और संबंधित पक्षों के बयानों पर आधारित है। रिपोर्ट में उल्लिखित आरोपों का अंतिम सत्यापन किसी सक्षम जांच या आधिकारिक निष्कर्ष के अधीन है।)

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